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Thursday, 20 February 2025

मासिक गोष्ठी माह फरवरी २०२५

मासिक काव्यगोष्ठी
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मध्यप्रदेश लेखक संघ, इंदौर इकाई
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गोष्ठी दिनांक १७ फरवरी २०२५
स्थान :- श्रीमध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति , इन्दौर

छांदस कविता दीर्घकाल तक जीवित रहती है, दिल में बैठती है और दूर तक जाती है। यह बात मध्यप्रदेश लेखक संघ की मासिक काव्य गोष्ठी में अध्यक्षता करते हुए इकाई  अध्यक्ष प्रभु त्रिवेदी ने कही। श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के पुस्तकालय सभागार में सोमवार अपराह्न गीत, ग़ज़ल और दोहों की त्रिवेणी प्रवहमान रही। रचनापाठ करते हुए सुधीर लोखण्डे 'अपेक्षित 'ने पढ़ा :--
 
‘वो कर्म ही कोई कर्म है, जिसमें सुसंस्कार नहीं’ 

दिनेश दवे ‘देव’ के तेवर कुछ यूँ थे :-- 
‘समय के कहाँ होते हैं हम पाबंद, लेकिन होते हैं कुछ चंद’। 

ग़ज़लकार सुब्रतो बोस ने ज़वानी की बात कही :---
‘आशिकी की हसरतें हमसे न कीजिये, 
बहके हुए ज़ज़्बात हैं, यूँ ही समझ लीजिये’। 

गीतकार सुरेंद्र व्यास ‘सरल’ ने सुनाया :----
‘शीत सब हथियार डाले, धूप ने अपने पाँव निकाले, 
छायी है मस्त बहार, फागुन आया रे’। 

डॉ. दीप्ति गुप्ता की ग़ज़ल का शेर है :---
‘रेत-सी तप रही थी, सजल हो गई, तुम्हारे रंग में रंगी, मैं ग़ज़ल हो गई’। 

इकाई के कोषाध्यक्ष व हास्य के मंचीय कवि प्रदीप नवीन ने सुनाया :---
‘कुछ भी अच्छा पढ़ नहीं पाया, इसलिये आगे बढ़ नहीं पाया’। 

कार्यक्रम का संचालन कर रहे इकाई सचिव संतोष मोहंती ‘दीप’ ने शहीदों का स्मरण करते हुए भावनाप्रधान गीत सुनाया :----
' देश पर जो कुर्बान हो गए, उन शहीदों को नमन ’। 

वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार करते हुए इकाई अध्यक्ष प्रभु त्रिवेदी ने 
दोहे में कहा :--- 
‘साथ बहू के पुत्र है, मात-पिता चुपचाप। ख़ुद का जाया कह रहा, रहो अकेले आप’। इनके अतिरिक्त डॉ. ज्योति सिंह, अभियंता श्यामसिंह, अमरसिंह मानावत आदि अन्य साहित्यप्रेमियों ने भी रचनाएँ पढ़ीं। इस तरह नए रचनाकारों की उपस्थिति ने आयोजन को और गौरव प्रदान किया |

इकाई डेस्क

( समूह चित्र )

Sunday, 24 November 2024

जीवन सरिता

*जीवन सरिता*

जीवन है एक सरिता 
सरिता के ये तटबन्ध
तटबन्धों पर सटे सुहाने घाट
ये घाट साक्षी है -
जीवन प्रवाह के
साक्षी है धार के, 
गुजरते पानी के,
चढ़ते उफान के, 
झरते प्रपात के,
और जल की शीतलता के,
निर्मलता के, सरलता के
झरोखे इतिहास के

तनिक ठहरो!
और सोचो!
क्या है यह सब

तट हैं जन्म और मृत्यु
सरिता है जीवन,
बहने की ऊर्जा का
कौन है परम स्रोत?
गन्तव्य का प्रबोध?

क्या है?
जल का पुनः पुनः लौटना,
फिर फिर बहना,

प्रतिक्षण बदलती है सरिता
हम कहते हैं
'सरिता बहती है'
नहीं, वहॉं बहता पानी है

ठीक इसी तरह,
जीवन नहीं
समय के पल बहते हैं
उद्गम से अवसान तक-
जन्म से निर्वाण तक-
नित्य, निरन्तर, अविरल
कल - कल, छल - छल

लेकिन अब ध्यान से सुनो!
सरिता में मैं बहता हूँ
हाँ! जल का मैं कण हूँ,
आत्मा हूँ इसकी
यहाँ भी मैं - वहाँ भी मैं
मैंने तट देखे, तट बन्ध देखे
श्वासों के अनुबन्ध देखे
उतार देखे, चढ़ाव देखे
मेरी यात्रा सागर की ओर उन्मुख है
हाँ, मै ही बहता हूँ उस ओर
राह में कहीं प्रपात हूँ
कहीं धार हूँ

कई नाम है मेरे

पर मैं जल का कण हूँ
हाँ मैं ही हूँ.
न जीता हूँ , न मरता हूँ
मैं यहाँ भी हूँ  - 

मैं ही वहाँ भी हूँ

रामनारायण सोनी

Thursday, 18 January 2018

आत्मा की अनंत गहराई

April 1969

आत्मा की अनंत गहराई का प्राकट्य-स्वप्न

दो प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर प्राप्त करने के उपरान्त मुनि गार्ग्य सौययिणी ने महर्षि पिप्पलाद से तीसरा प्रश्न पूछा- “कौन देवता स्वप्नों को देखता है।” मुनिवर के इस प्रश्न का उत्तर देते हुये महर्षि ने बताया-

“अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनु भवति।

यद् दृष्टं दृष्टमनुपश्यत श्रुत श्रुतमेवार्थ मनुश्रणोति।

देश विगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुत चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्व पश्यति सर्वः पश्यति।

प्रश्नोपनिषद् चतुर्थ।5,

हे महामुनि ( स्वप्नावस्था में जीवात्मा ही मन और सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा अपनी विभूति का अनुभव करता है। इसने पिछले अनेक जन्मों में जहाँ कहीं भी जो कुछ बार-बार देखा सुना और अनुभव किया हुआ है उसी को स्वप्न में बार-बार देखता-सुनता और अनुभव करता है। परन्तु यह नियम नहीं है कि जागृत अवस्था में इसने जिस प्रकार जिस ढंग से जिस जगह जो घटना देखी सुनी और अनुभव की है, उसी प्रकार यह स्वप्न में भी अनुभव करता है, अपितु स्वप्न में जागृत की किसी घटना का कोई अंश किसी दूसरी घटना के किसी अंश के साथ मिलकर एक नये ही रूप में इसके अनुभव में आता है। अतः यह स्वप्न में देखे और न देखे हुये को भी देखता है, सुने और न सुने हुये को भी सुनता है, अनुभव किये और अनुभव में न आये हुये को भी अनुभव करता है। जो वस्तु हो गई है और जो वस्तु आगे होती है, उसे भी देख लेता है। इस प्रकार स्वप्न में यह विचित्र ढंग से सब घटनाओं का बार-बार अनुभव करता है और स्वयं भी सब कुछ बनकर देखता है, उस समय जीवात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरी वस्तु नहीं रहती।

अगले प्रश्न के उत्तर में महर्षि पिप्पलाद ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि स्वप्नावस्था में मन उदान वायु के आधीन हो जाता है, उदान वायु द्वारा मन जब हृदय गुहा में पहुँच जाता है तो मन की शक्ति समाप्त होकर वह आत्मा में परिणित हो जाती है। उस मोहित अवस्था का नाम ही स्वप्न है और उस समय जो कुछ सुख-दुःख की अनुभूति होती है वह मन को नहीं आत्मा को ही होती है।

उपरोक्त तथ्यों के प्रमाण में उन स्वप्नों को रखा जा सकता है, जिनसे भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पूर्वाभास स्वप्न में हुआ। अन्य व्यक्ति के साथ दूरस्थ स्थान में हो रही घटनाओं का आभास किसी और को और स्थान में हुआ और बाद में उन्हें पूर्णतया सत्य पाया गया। कुछ स्वप्न ऐसे भी हुए हैं, जिनमें किसी महत्त्वपूर्ण कार्य का ज्ञान या अनुभूति स्वप्न में हुई और उसके द्वारा कुछ विशिष्ट कार्य या आविष्कार तक सम्भव हुये।

यदि स्वप्न मन का ताना-बाना होता, जैसा कि फ्रायड और उसके अनुयाइयों का मत है तो इस प्रकार के पूर्वाभास और इन्द्रियातीत ज्ञान जागृत अवस्था में ही मिल जाया करते, क्योंकि उस समय मन अधिक सक्षम और क्रियाशील रहता एवं सुनियोजित ढंग से सोच सकता है पर जागृत अवस्था में ऐसे किसी पूर्वाभास की अनुभूति न होना यह बताता है कि स्वप्न सुख या दृश्यों की अनुभूति वस्तुतः मन से भी परे किसी विश्व-व्यापी और सूक्ष्म सता द्वारा हो सकता है, यह गुण आत्मा के गुणों से मेल खाते हैं, इसलिए यह मानने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिये कि मनुष्य शरीर में ‘आत्मा’ नामक कोई त्रिकालदर्शी तत्त्व विद्यमान् है और उसका पूर्ण ज्ञान प्राप्त किये बिना मनुष्य की समस्यायें सुलझ नहीं पातीं।

यों पूर्व-जन्मों की घटनाओं और अनुभवों की सत्यता के स्पष्ट प्रमाण नहीं जुटाये जा सकते पर वर्तमान और भविष्य में घटने वाली घटनाओं के पूर्वाभास यह बताते हैं कि स्वप्न निःसंदेह आत्मा के विज्ञान का वह पहलू हैं, जिससे उसके अनेक रहस्यों का प्रकट प्रमाण पाया जा सकता है। स्वप्नों से रेखा चित्र और अपनी तरह के निर्मित स्वप्न देखने के यन्त्र वैज्ञानिकों ने बनाये हैं यदि इस दिशा में और प्रगति हुई और उन स्वप्न रेखाओं के विस्तृत अध्ययन का कोई सूत्र वैज्ञानिक निकाल पाये तो जीव पूर्वजन्मों में किस योनि में था और उसके साथ कैसी कैसी घटनायें घटीं, यह सब जान लेना सम्भव हो जायेगा। अभी जो जानकारियाँ मिली हैं उनके अनुसार स्वप्नावस्था में लिए गये चित्रों की रेखाएँ इलेक्ट्रानिक स्मृति कणों के फलस्वरूप ही होती हैं, यद्यपि अभी उनका विश्लेषण (एनालिसिस) किया जाना सम्भव नहीं हो पाया तो भी भविष्यदर्शी स्वप्नों के अनेक प्रामाणिक दृष्टान्त अवश्य हैं जो आत्मा की गहराई की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं।

‘ट्रू एक्सपीरियन्सेज इन प्रोफेसी’ (भविष्यवाणी के सत्य अनुभव) नामक पुस्तक की लेखिका मार्टिन एबान ने ‘चार काले घोड़े’ नामक शीर्षक से अपने जीवन के उन चार स्वप्नों का वर्णन बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। वह इस तरह हैं-

मुझे अनेक बार अपने परिवार और परिचित मित्रों की मृत्यु का पूर्वाभास एक ही ढंग से हुआ है। पहला स्वप्न मुझे तब आया जब में छोटी बच्ची थी। मैंने देखा मैं एक ऐसी घोड़ा गाड़ी में सवार हूँ, जिसमें चार काले घोड़े जुते हुए हैं। जैसे ही मैं गाड़ी में बैठी किसी अदृश्य शक्ति ने मुझे कुछ आदेश दिये। गाड़ी एक मकान के किनारे रुक गई मैं उसके पिछले भाग में गई। दो कमरों के बीच एक शयन कक्ष (बैडरूम) पड़ता था वहाँ पहुँचकर मुझे ऐसा लगा कोई अधेड़ आयु (मिडिल एज्डमैन) लेटा है, उसकी साँस से दुर्गन्ध निकल रही है मैं चिल्लाई पर उस व्यक्ति पर उसका कोई असर नहीं हुआ। इसी बीच मुझे अनेक स्त्रियाँ दिखाई दीं। उन्होंने एक कम उम्र की पौढ़ा (शार्ट मिडिल एज्ड वूमन) को घेर रखा था और उसे धीरज बँधा रही थीं। इसके बाद नींद टूट गई और में समझ नहीं पाई कि यह सब क्या था पर उस स्वप्न का कुछ विशेष प्रभाव मेरे मन में था, क्योंकि नींद टूट जाने के बाद भी उसे मैं एकाएक भुला न सकी वह दृश्य बार-बार मस्तिष्क में उठता रहा और मैं उपेक्षा करती रही- अब सोचती हूँ ऐसी उपेक्षाओं ने ही मनुष्य जीवन के अनेक आवश्यक आध्यात्मिक पहलुओं को गौण बना दिया है और उसी के फलस्वरूप मनुष्य जीवन सत्य से दूर हटता चला जा रहा है।

उन दिनों मैं टोरोण्टो की एक मीटिंग में भाग लेने गई थी। दूसरे ही दिन मेरे कमरे की साथी (रुममेट) आलेन्दा जो कि क्यूबेक की निवासिनी थी ने मुझे बुलाया और बताया कि उसके पिता बीमार हैं, उसके कुछ दिन बाद ही पिता की मृत्यु का समाचार भी आ गया। बस इस घटना का पहला पटाक्षेप यहीं हो गया।

उसी वर्ष जुलाई में मैं क्यूबेक शहर गई। अचानक मेरी दृष्टि एक मकान पर स्थिर हो गई। मैंने देखा हूबहू वही मकान जिसे मैंने स्वप्न में देखा था। दो कमरे बीच में शयन-कक्ष उसी कमरे में एक चित्र टँगा था वो बिलकुल उसी आकृति का था, जैसा मैंने स्वप्न में देखा था, यह मकान ओलेन्दा का था और उसने ही बताया कि यह चित्र उसके पिता का है तो मैं स्तब्ध रह गई और सोचने लगी क्या वह स्वप्न मुझे इसी घटना के पूर्वाभास के रूप में देखने को मिला था। यदि ऐसा ही था तो वह स्वप्न ओलेन्दा को क्यों नहीं दिखा? क्या मेरी मानसिक स्थिति धर्म-मुखी और पवित्र होने के कारण स्वप्न मुझे स्पष्ट दिखा और ओलेन्दा को न दिखा। यह प्रश्न सोचते सोचते मैं एक गहराई में डूब जाती हूँ और यह मानने लगती हूँ कि इस संसार में सचमुच ही कोई सर्वव्यापी, सर्वदृष्टा शक्ति है, जब मनुष्य उसमें खो जाता है तो स्वयं भी वैसा ही अनुभव करने लगता हैं।

सिलाई की मशीन के आविष्कारक एलियस होवे ने भी एक ऐसा ही विचित्र स्वप्न देखा जिसने उसकी बड़ी भारी गुत्थी को ही सुलझा दिया। एलियस होवे ने जब अपनी सारी मशीन तैयार करके उसे फिट कर लिया, तब उसकी समझ में आया कि सुई में ऊपर छेद रखने से मशीन सिलाई नहीं कर सकती तो फिर छेद कहाँ रखा जाये, इसी बात पर सारा आविष्कार अटक गया। उसका मस्तिष्क चकरा गया, क्योंकि उसका इतने दिन का परिश्रम व्यर्थ गया ऐसी स्थिति में सिवाय भगवान का नाम लेने के अतिरिक्त उसे और कुछ न सूझ पड़ा।

होवे ने एक रात स्वप्न देखा। उसने देखा कुछ दस्युओं ने उसे पकड़ लिया है और जंगली जाति के राजा के यहाँ पकड़कर ले गये। राजा की वेशभूषा और आकृति भी भयंकर थी। राजा ने कड़ककर कहा- “शाम तक सिलाई की मशीन तुम मुझे सौंप दोगे या नहीं।” कुछ न बोलने पर एक सिपाही एक नुकीला भाला लेकर सामने आया और बार बार छाती की ओर भाला ले जाता पीछे हटाता और फिर वही प्रश्न पूछता बोला - “मशीन शाम तक देगा या नहीं।” आविष्कारक .......... की दृष्टि भाले पर ही थी और वह बहुत डर गया था, साँस तेज हो जाने से नींद टूट गई पर घबड़ाहट अभी ज्यों की त्यों थी। नींद टूटने के बाद भी भाले का आने-जाने वाला दृश्य मस्तिष्क में बराबर झूल रहा था और इसी दृश्य ने उसकी समस्या हल कर दी, उसने मशीन में एक ऐसा पेंच फिट कर दिया जिससे सुई भाले की तरह नीचे-ऊपर जाने लगी और दुस्तर समस्या भी मिनटों में सुलझ गई। मशीनें कई तरह की बन चुकी हैं पर सभी जानते हैं सिलाई करने वाली सुई हर मशीन में उसी तरह आगे-पीछे जाकर मिलती है।

28 फरवरी 1844 को वाशिंगटन (अमेरिका) में एक बड़ा भारी राष्ट्रीय उत्सव होने वाला था। उसमें दो तोपों का प्रदर्शन भी किया जाने वाला था। विशिष्ट मेहमानों में तीनों सेनाओं के सेनाध्यक्ष और उच्च-सैनिक अधिकारी कर्नल डेविड गार्डिनर उनकी पुत्री जूलिया (प्रेसीडेन्ट टेलर की पत्नी) तथा जलसेना के नव-निर्वाचित सेक्रेटरी श्री थामस डब्ल्यू गिलमर व उनकी पत्नी ऐनी प्रमुख था।

27 फरवरी की रात ऐनी और जूलिया दोनों ने स्वप्न में अपने पतियों की मृत्यु देखी। जूलिया ने अपने पिता को बताया कि आज ऐसा होने वाला है आप लोगों को इस उत्सव में सम्मिलित नहीं होना चाहिये। किन्तु गार्डिनर ने वह बात अनसुनी कर दी। इसी तरह ऐनी गिलमर ने भी अपने पति को वहाँ जाने से रोका किन्तु उन्होंने भी नहीं माना। इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि उस दिन दोनों तोपों के गोले बैरेल में ही फट जाने (परमिचर) के कारण उक्त दोनों व्यक्तियों की ठाँव मृत्यु हो गई। बाद में जूलिया ने प्रेसीडेन्ट टेलर से विवाह कर लिया।

जूलिया ने एक स्थान पर लिखा है कि - “वह पति के सौ मील दूर रहने पर भी वह किस अवस्था में हैं, यह स्वप्न द्वारा जान लेती है।” एक रात उसने अपने पति प्रेसीडेन्ट टेलर को पीले चेहरे में देखा। उसे लगा कि अपने हाथ से कमीज और टाई पकड़े प्रेसीडेन्ट कह रहे हैं, “मेरा सिर थाम लो।” इस स्वप्न से जूलिया बहुत घबराई। प्रेसीडेन्ट टेलर तब रिचमोन्ड में थे। जूलिया ने प्रातःकाल वहाँ के लिए प्रस्थान किया। वह सकुशल थे। किन्तु जिस होटल में वे ठहरे थे, उसी दिन दुर्घटना हो गई और मृत्यु का ठीक वही दृश्य उपस्थित हुआ जो जूलिया ने रात स्वप्न में देखा था।

Friday, 9 June 2017

नाप चली आकाश चिरैया

मैं हूँ प्यारी सोन चिरैया
धरती के आँगन मैं खेली
बचपन मेरा विभव भरा
यौवन की दहलीज रुपहली

बंधी व्याध की पाश प्रबल मेरी आशाएँ
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

मैं थी अपना एक गगन था
उम्मीदों में संग पवन था
मेरा मन अपने ही जग में
अपने ही उल्लास मगन था

काल निशा बन जीवन में गहराए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

तिनका तिनका चुन कर मैंने
नन्हा सा था नीड़ बनाया
नीचे बगिया महक रही थी
चंचरीक था संग संग गाया

दावानल मुट्ठी में भर भर क्यों लाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

जुड़ कर टूटी, जुड़ी टूट कर
भीषण संघर्षों की वीथी में
पैर जमाए खड़ी रही हूँ
झंझा के अंधे कलरव में

जीवन-सागर में क्यों सुनामी लाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

पंख बँधे हैं फिर भी मेरे
हाथों में पुरुषार्थ भरा है
मेरी चिचियाहट में अब भी
शब्दों का एक कोष भरा है

संकल्पों के कल्प मेरे गिनने आए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

जिस पल बन्द खुलेंगे मेरे
फिर से होगा गगन मेरा
उफनेगा उल्लास सिंधु का
नाचेगा मन मोद भरा

अपने कर्म बीज मुझे गिनाने आए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो

आज उषा में नवप्रभात है
खण्ड खण्ड वे दम्भ पड़े हैं
पगडण्डी के पथ वे सारे
राजपथों से आज जुड़े हैं

देख उन्हें ही शायद इतने चुँधियाए हो
निष्ठुर बन कर कौन कहाँ से आए हो



Friday, 19 May 2017

कहानियाँ

यह कहानी श्री बी. डी. गुहा द्वारा वाट्सप पर भेजी गई

" भूख से मौत "
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जाने क्या सोच कर 'हरिया ' नाम रखा
उसका जीवन भर न तो हरियाली देखि न जीवन में हरापन ,सदा हारा हुआ ही रहा
      माता ,पिता, भाई ,बहन,पत्नी,
बच्चे सभी अकाल बीमारी की भेंट
चढ़े,  रह गया केवल हरिया कमजोर
बूढा लाचार जीने के लिए मात्र!चन्द
रूपये की तथाकथित पेंसन और पांच
किलो  मोटा अनाज वः भी सरपंच
सचिव सेल्समेन की मेहरबानी पर !
        उस दिन तो गजब हिहो गया सारे गाँव में हल्ला मचा हुआ था क़ि
" हरिया मर गया "
गाँव के ही एक छुट भैया 'पत्रकार ने
"सांध्य दैनिक " को खबर  भेज दी
"हरिया की मौत ! भूख से हुई "
जब यह समाचार छपा उसके बाद सारे शहर में  हड़ कंप मच गया....
     शासन-प्रशासन स्तर से  इस 'खबर' का 'जोरदार ' खंडन किया
गया किन्तु विपक्षी दल कहाँ मानने
वाले थे ! सबने शासन एवम् शासकीय
कार्यप्रणाली की खूब लानत-मलामत
की जिलाध्यक्ष ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए "जांच " की घोषणा कर दी .
      जांच प्रारम्भ की गई सबसे पहले
तय हुआ "हरिया की लाश का शव -
परिक्षण "किया जावेगा लाश जिला
अस्पताल ले जाई गई ....
तब तक एस डी एम ने गाव का दौरा
कर हरिया की टूटी-फूटी झोपडी का
निरीक्षण कर उसमे अनाज रखवा दिया सरपंच ने भी अपने बयान में
झोपड़ी में अनाज होना बताया
     दुसरे दिन शव परीक्षण की रिपोर्ट
के साथ हरिया की लाश वापस गांव
पहुची शव परीक्षण रिपोर्ट में कहा गया "हरिया के पेट में अन्न का एक -
दाना पाया गया "
     हरिया की मौत भूख से नहीं  हुई है
"वह स्वाभाविक मौत से मरा है "
लाश को घेरकर खड़े जमींदार ज़ालिम
पटवारी घसीटा राम सरपंच गोलमाल
सेल्समेन लेभागाराम तहसीलदार-
संग्रह सिंह एस डी एम पहुचाराम
सभी किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े थे सर
झुकाये किसी के चहरे पर ग्लानि न थी
   किन्तु सभी की अंतरात्मा धिक्कार
रही थी...
   "हम सब ने हरिया को तिल-तिल कर मारा है "
हरिया ही नहीं मानवता भी मारी गई
किन्तु कोई स्वीकार ने को तैयार नहीं की " हरिया की मौत! भूख से हुई "
घटना और घटना के साथ जुड़े हुए
नाम काल्पनिक है .....
रचनाकार बी. डी.गुहा रायपुर
       छत्तीसगढ़

Friday, 3 June 2016

ओशो चिन्तन1

ओशो चिन्तन

आंसुओं से भयभीत मत होना

आंसुओं से कभी भी भयभीत मत होना। तथाकथित सभ्यता ने तुम्हें आंसुओं से अत्यंत भयभीत कर दिया है। इसने तुम्हारे भीतर एक तरह का अपराध भाव पैदा कर दिया है। जब आंसू आते हैं तो तुम शर्मिंदा महसूस करते हो। तुम्हें लगता है कि लोग क्या सोचते होंगे? मैं पुरुष होकर रो रहा हूं!यह कितना स्त्रैण और बचकाना लगता है। ऐसा नहीं होना चाहिये। तुम उन आंसुओं को रोक लेते हो… और तुम उसकी हत्या कर देते हो जो तुम्हारे भीतर पनप रहा होता है।

जो भी तुम्हारे पास है, आंसू उनमें सबसे अनूठी बात है, क्योंकि आंसू तुम्हारे अंतस के छलकने का परिणाम हैं। आंसू अनिवार्यत: दुख के ही द्योतक नहीं हैं; कई बार वे भावातिरेक से भी आते हैं, कई बार वे अपार शांति के कारण आते हैं, और कई बार वे आते हैं प्रेम व आनंद से। वास्तव में उनका दुख या सुख से कोई लेना-देना नहीं है। कुछ भी जो तुमारी ह्रदय को छू जाये, कुछ भी जो तुम्हें अपने में आविष्ट कर ले,कुछ भी जो अतिरेक में हो, जिसे तुम समाहित न कर सको, बहने लगता है, आंसुओं के रूप में ।

इन्हें अत्यंत अहोभाव से स्वीकार करो, इन्हें जीयो, उनका पोषण करो, इनका स्वागत करो, और आंसुओं से ही तुम जान पाओगे प्रार्थना करने की कला।

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मनुष्य को प्रतिक्षण और प्रतिपल नया कर लेना होता है। उसे अपने को ही जन्म देना होता है। स्वयं के सतत जन्म की इस कला को जो नहीं जानते हैं, वे जानें कि वे कभी के मर चुके हैं।
रात्रि कुछ लोग आये । वे पूछने लगे, ''धर्म क्या है?'' मैंने उनसे कहा, ''धर्म मनुष्य के प्रभु में जन्म की कला है। मनुष्य में आत्म-ध्वंस और आत्म-स्रजन की दोनों ही शक्तियां हैं। यही उसका स्वयं के प्रति उत्तरदायित्व है। उसका अपने प्रति प्रेम विश्व के प्रति प्रेम का उद्भव है। वह जितना स्वयं को प्रेम कर सकेगा, उतना ही उसके आत्मघात का मार्ग बंद होता है। और, जो-जो उसके लिए आत्मघाती है, वही-वही ही औरों के लिए अधर्म है। स्वयं की सत्ता और उसकी संभावनाओं के विकास के प्रति प्रेम का अभाव ही पाप बन जाता है। इस भांति पाप और पुण्य, शुभ और अशुभ, धर्म और अधर्म का स्रोत उसके भीतर ही विद्यमान है- परमात्मा में या अन्य किसी लोक में नहीं। इस सत्य की तीव्रता और गहरी अनुभूति ही परिवर्तन लाती है और उस उत्तरदायित्व के प्रति हमें सजग करती है, जो कि मनुष्य होने में अंतर्निहित है। तब, जीवन मात्र जीना नहीं रह जाता। उसमें उदात्त तत्वों का प्रवेश हो जाता है और हम स्वयं का सतत सृजन करने में लग जाते हैं। जो इस बोध को पा लेते हैं वे प्रतिक्षण स्वयं को ऊ‌र्ध्व लोक में जन्म देते रहते हैं। इस सतत सृजन से ही जीवन का सौंदर्य उपलब्ध होता है, जो कि क्रमश: घाटियों के अंधकार और कुहासे से ऊपर उठकर हमारे हृदय की आंखों को सूर्य के दर्शन में समर्थ बनाता है।''
जीवन एक कला है। और, मनुष्य अपने जीवन का कलाकार भी है और कला का उपकरण भी। जो जैसा अपने को बनाता है, वैसा ही अपने को पाता है। स्मरण रहे कि मनुष्य बना-बनाया पैदा नहीं होता। जन्म से तो हम अनगढ़े पत्थरों की भांति ही पैदा होते हैं। फिर, जो कुरूप या सुंदर मूर्तियां बनाती हैं, उनके स्रष्टा हम ही होते हैं।
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स्वप्न की उपेक्षा नहीं!



एक गांव गया था। किसी ने पूछा कि आप क्या सिखाते हैं? मैंने कहा, ''मैं स्वप्न सिखाता हूं।'' जो मनुष्य सागर के दूसरे तट के स्वप्न नहीं देखता है, वह कभी इस तट से अपनी नौका को छोड़ने में समर्थ नहीं होगा। स्वप्न ही अनंत सागर में जाने का साहस देते हैं।
कुछ युवक आये थे। मैंने उनसे कहा, ''आजीविका ही नहीं, जीवन के लिए भी सोचो। सामयिक ही नहीं, शाश्वत भी कुछ है। उसे जो नहीं देखता है, वह असार में ही जीवन को खो देता है।'' वे कहने लगे, ''ऐसी बातों के लिए पास में समय कहां है? फिर, ये सब- सत्य और शाश्वत की बातें स्वप्न ही तो मालूम होती हैं?'' मैंने सुना और कहा, ''मित्रों, आज के स्वप्न ही कल के सत्य बन जाते हैं। स्वप्नों से डरो मत और स्वप्न कहकर कभी उनकी उपेक्षा मत करना। क्योंकि ऐसा कोई भी सत्य नहीं है, जिसका जन्म कभी न कभी स्वप्न की भांति न हुआ हो। स्वप्न के रूप में ही सत्य पैदा होता है। और वे लोग धन्य हैं, जो कि घाटियों में रहकर पर्वत शिखरों के स्वप्न देख पाते हैं, क्योंकि वे स्वप्न ही उन्हें आकांक्षा देंगे और वे स्वप्न। ही उन्हें ऊंचाइयां छूने के संकल्प और शक्ति से भरेंगे। इस बात पर मनन करना है। किसी एकांत क्षण में रुक कर इस पर विमर्श करना। और यह भी देखना कि आज ही केवल हमारे हाथों में है- अभी के क्षण पर केवल हमारा अधिकार है। और समझना कि जीवन का प्रत्येक क्षण बहुत संभावनाओं से गर्भित है और यह कभी पुन: वापस नहीं लौटता है। यह कहना कि स्वप्नों के लिए हमारे पास कोई समय नहीं है, बहुत आत्मघातक है। क्योंकि इसके कारण तुम व्यर्थ ही अपने पैरों को अपने हाथों ही बांध लोगे। इस भाव से तुम्हारा चित्त एक सीमा में बंध जावेगा और तुम उस अद्भुत स्वतंत्रता को खो दोगे, जो कि स्वप्न देखने में अंतर्निहित होती है। और, यह भी तो सोचो कि तुम्हारे समय का कितना अधिक हिस्सा ऐसे प्रयासों में व्यय हो रहा है, जो कि बिलकुल ही व्यर्थ हैं और जिनसे कोई भी परिणाम आने को नहीं है? क्षुद्रतम बातों पर लड़ने, अहंकार से उत्पन्न वाद-विवादों को करने, निंदाओं और आलोचनाओं में - कितना समय तुम नहीं खो रहे हो? और, शक्ति और समय अपव्यय के ऐसे बहुत से मार्ग हैं। यह बहुमूल्य समय ही जीवन-शिक्षण-चिंतन, मनन और निदिध्यासन में परिणत किया जा सकता है। इससे ही वे फूल उगाये जा सकते हैं, जिनकी सुगंध अलौकिक होती है और उस संगीत को सुना जा सकता है, जो कि इस जगत का नहीं है।''
अपने स्वप्नों का निरीक्षण करो और उनका विश्लेषण करो। क्योंकि, कल तुम जो बनोगे और होओगे, उस सबकी भविष्यवाणी अवश्य ही उनमें छिपी होगी

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मन को जानों!



मनुष्य का मन ही सब कुछ है। यह मन सब कुछ जानना चाहता है। लेकिन, ज्ञान केवल उन्हें ही उपलब्ध होता है, जो कि इस मन को ही जान लेते हैं।
कोई पूछता था, ''सत्य को पाने के लिए मैं क्या करूं?'' मैंने कहा, ''स्वयं की सत्त में प्रवेश करो। और, यह होगा चित्त की जड़ पकड़ने से। उसके शाख-पल्लवों की चिंता व्यर्थ है। चित्त की जड़ को पकड़ने के लिए आंखों को बंद करो और शांति से विचारों के निरीक्षण में उतरो। किसी एक विचार को लो और उसके जन्म से मृत्यु तक का निरीक्षण करो।'' लुक्वान यू ने कहा है, ''विचारों को ऐसे पकड़ो, जैसे कि कोई बिल्ली चूहे की प्रतीक्षा करती और झपटती है।'' यह बिलकुल ठीक कहा। बिल्ली की भांति ही तीव्रता, उत्कटता और सजगता से प्रतीक्षा करो। एक पलक भी बेहोशी में न झपे और फिर जैसे ही कोई विचार उठे, झपटकर पकड़ लो। फिर उसका सम्यक निरीक्षण करो। वह कहां से पैदा हुआ और कहां अंत होता है- यह देखो। और, यह देखते-देखते ही तुम पाओगे कि वह तो पानी के बुलबुले की भांति विलीन हो गया है या कि स्वप्न की भांति तिरोहित। ऐसे ही क्रमश: जो विचार आवें, उनके साथ भी तुम्हारा यही व्यवहार हो। इस व्यवहार से विचार का आगमन क्षीण होता है और निरंतर इस भांति उन पर आक्रमण करने से वे आते ही नहीं हैं। विचार न हों, तो मन बिलकुल शांत हो जाता है। और, जहां मन शांत है, वहीं मन की जड़ है। इस जड़ को जो पकड़ लेता है, उसका स्वयं में प्रवेश होता है। स्वयं में प्रवेश पा लेना ही सत्य को पा लेना है।
सत्य जानने वाले में ही छिपा है। शेष कुछ भी जानने से वह नहीं उघड़ता। ज्ञाता को ही जो जान लेते हैं, ज्ञान उन्हें ही मिलता है। ज्ञेय के पीछे मत भागो। ज्ञान चाहिए, तो ज्ञाता के भी पीछे चलना आवश्यक है।

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स्वयं की खोज
स्मरण रखना कि इस जगत में स्वयं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं पाया जा सकता है। जो उसे खोजते हैं, वे पा लेते हैं और जो उससे अन्यथा कुछ खोजते हैं, वे अंतत: असफलता और विषाद को ही उपलब्ध होते हैं। वासनाओं के पीछे छोड़ने वाले लोग नष्ट हुए हैं- नष्ट होते हैं- और नष्ट होंगे। वह मार्ग आत्म-विनाश का है।
''एक छोटे से घुटने के बल चलने वाले बालक ने एक दिन सूर्य के प्रकाश में खेलते हुए अपनी परछाई देखी। उसे एक अद्भुत वस्तु जान पड़ी। क्योंकि, वह हिलता तो उसकी वह छाया भी हिलने लगती थी। वह छाया का सिर पकड़ने का उद्योग करने लगा। किंतु, जैसे ही वह छाया का सिर पकड़ने के लिए बढ़ता कि वह दूर हो जाता। वह कितना ही बढ़ता गया, लेकिन पाया कि सिर तो सदा उतना ही दूर है। उसके और छाया के बीच फासला कम नहीं होता था। थक कर और असफलता से वह रोने लगा। द्वार पर भिक्षा को आए हुए एक भिक्षु ने यह देखा। उसने पास आकर बालक का हाथ उसके सिर पर रख दिया। बालक रोता था, हंसने लगा; इस भांति छाया का मस्तक भी उसने पकड़ लिया था।''
कल मैंने यह कथा कही और कहा, ''आत्मा पर हाथ रखना जरूरी है। जो छाया को पकड़ने में लगते हैं, वे उसे कभी भी नहीं पकड़ पाते। काया छाया है। उसके पीछे जो चलता है, वह एक दिन असफलता से रोता है।''
वासना दुष्पूर है। उसका कितना ही अनुगमन करो, वह उतनी ही दुष्पूर बनी रहती है। उससे मुक्ति तो तब होती है, जब कोई पीछे देखता है और स्वयं में प्रतिष्ठित हो जाता है।

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स्वयं की खोज

स्मरण रखना कि इस जगत में स्वयं के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं पाया जा सकता है। जो उसे खोजते हैं, वे पा लेते हैं और जो उससे अन्यथा कुछ खोजते हैं, वे अंतत: असफलता और विषाद को ही उपलब्ध होते हैं। वासनाओं के पीछे छोड़ने वाले लोग नष्ट हुए हैं- नष्ट होते हैं- और नष्ट होंगे। वह मार्ग आत्म-विनाश का है।
''एक छोटे से घुटने के बल चलने वाले बालक ने एक दिन सूर्य के प्रकाश में खेलते हुए अपनी परछाई देखी। उसे एक अद्भुत वस्तु जान पड़ी। क्योंकि, वह हिलता तो उसकी वह छाया भी हिलने लगती थी। वह छाया का सिर पकड़ने का उद्योग करने लगा। किंतु, जैसे ही वह छाया का सिर पकड़ने के लिए बढ़ता कि वह दूर हो जाता। वह कितना ही बढ़ता गया, लेकिन पाया कि सिर तो सदा उतना ही दूर है। उसके और छाया के बीच फासला कम नहीं होता था। थक कर और असफलता से वह रोने लगा। द्वार पर भिक्षा को आए हुए एक भिक्षु ने यह देखा। उसने पास आकर बालक का हाथ उसके सिर पर रख दिया। बालक रोता था, हंसने लगा; इस भांति छाया का मस्तक भी उसने पकड़ लिया था।''
कल मैंने यह कथा कही और कहा, ''आत्मा पर हाथ रखना जरूरी है। जो छाया को पकड़ने में लगते हैं, वे उसे कभी भी नहीं पकड़ पाते। काया छाया है। उसके पीछे जो चलता है, वह एक दिन असफलता से रोता है।''
वासना दुष्पूर है। उसका कितना ही अनुगमन करो, वह उतनी ही दुष्पूर बनी रहती है। उससे मुक्ति तो तब होती है, जब कोई पीछे देखता है और स्वयं में प्रतिष्ठित हो जाता है।

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स्वयं से पूछो : ''मैं कौन हूं?''

''मैं कौन हूं?'' जो स्वयं से इस प्रश्न को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं। उस द्वार को खोलने की कुंजी यही है। स्वयं से पूछो कि ''मैं कौन हूं?'' और, जो प्रबलता से और समग्रता से पूछता है, वह स्वयं से ही उत्तर भी पा जाता है।
कारलाइल बूढ़ा हो गया था। उसका शरीर अस्सी वसंत देख चुका था। और जो देह कभी अति सुंदर और स्वस्थ थी, वह अब जर्जर और ढीली हो गई थी : जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे। ऐसे बुढ़ापे की एक सुबह की घटना है। कारलाइल स्नानगृह में था। स्नान के बाद वह जैसे ही शरीर को पोंछने लगा, उसने अचानक देखा कि वह देह तो कब की जा चुकी है, जिसे कि वह अपनी मान बैठा था! शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है। वह काया अब कहां है, जिसे उसने प्रेम किया था? जिस पर उसने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही तो शेष रह गया है? पर, साथ ही एक अत्यंत अभिनव-बोध भी उसके भीतर अकुंडलित होने लगा : ''शरीर तो वही नहीं है, लेकिन वह तो वही है। वह तो नहीं बदला है।'' और तब उसने स्वयं से ही पूछा था : ''आह! तब फिर मैं कौन हूं?'' यही प्रश्न प्रत्येक को अपने से पूछना होता है। यही असली प्रश्न है। प्रश्नों का प्रश्न यही है। जो इसे नहीं पूछते, वे कुछ भी नहीं पूछते हैं। और, जो पूछते ही नहीं, वे उत्तर कैसे पा सकगें?
पूछो- अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूंजने दो : ''मैं कौन हूं?'' जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है। और, वह उत्तर जीवन की सारी दिशा और अर्थ को परिवर्तित कर देता है। उसके पूर्व मनुष्य अंधा है। 

Saturday, 10 October 2015

लघु कथाएँ

लघु कथाएँ
१ 
क आदमी को महसूस कि भगवान उसके पास आ रहे हैं और उनके हाथ में एक सूट केस है !
भगवान ने कहा --पुत्र मेरे साथ चलो। आदमी ने जबाव दिया -अभी इतनी जल्दी अभी तो मुझे बहुत काम करने हैं। आपके इस सूट केस में क्या है? भगवान ने कहा -- तुम्हारा सामान ! क्या इसमें  मेरा धन !भगवान ने  कहा -नहीं, हैं। आदमी ने पूछा -- मेरी यादें ?  मेरी बुद्धिमत्ता ?  मेरा परिवार और मित्र हैं ? मेरा शरीर ? मेरी आत्मा ?
भगवान ने जबाव दिया -- इनमें से कोई भी नहीं।
आदमी की आँखें छल-छाला पड़ी। उसने कहा -- मेरे पास कभी भी कुछ नहीं था !
भगवान ने जबाव दिया -- यही सत्य है प्रत्येक क्षण जो तुमने जिया, वही तुम्हारा था, वे ही क्षण तुम्हारे हैं।  जो भी इस समय आपके पास है, उसे भरपूर जियें, आज में जियें ,अपनी जिंदगी जिए,खुश होना कभी न भूलें, यही एक बात महत्त्व रखती है !


एक बच्चा अपनी माँ के साथ एक दुकान पर गया। दुकानदार ने उसकी मासूमियत देखकर उसको सारी टॉफी  का डिब्बा खोलकर कहा-: “लो चाहे जितनी टॉफियाँ ले लो…!!!" पर उस बच्चे ने उन्हें मना करदिया. दुकानदार और उसकीमाँ ने उसे बहुत कहा पर वो मना करता रहा। तब उस दुकानदार ने खुद अपने हाथ से टॉफियाँ निकाल कर उसको दीं तो बच्चे ने ले लीं।
वापस आते हुऐ उसकी माँ ने पूछा कि ”जबअंकलतुम्हारे सामने डिब्बा खोल कर टाँफी दे रहे थे , तबतुमने नही ली और जब उन्होंने अपने हाथों से दीं तोले ली..!!ऐसा क्यों..??”तब उस बच्चे ने बहुत खूबसूरत प्यारा जवाब दिया-: “माँ मेरे हाथ छोटे-छोटे हैं… अगर मैं टॉफियाँलेता तो दो तीन टाँफियाँ ही आती जबकि अंकल केहाथ बड़े हैं इसलिये ज्यादा टॉफियाँ मिलगईं….!!!!!”बिल्कुल इसी तरह जब भगवान हमें देता है तो वोअपनी मर्जी से देता है और वो हमारी सोच से परेहोता है,हमें हमेशा उसकी मर्जी में खुश रहनाचाहिये….!!!क्या पता..?? वो किसी दिन हमें पूरा समंदर देनाचाहता हो और हम हाथ में चम्मच लेकर खड़े हों…