मासिक काव्यगोष्ठी
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मध्यप्रदेश लेखक संघ, इंदौर इकाई
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गोष्ठी दिनांक १७ फरवरी २०२५
स्थान :- श्रीमध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति , इन्दौर
छांदस कविता दीर्घकाल तक जीवित रहती है, दिल में बैठती है और दूर तक जाती है। यह बात मध्यप्रदेश लेखक संघ की मासिक काव्य गोष्ठी में अध्यक्षता करते हुए इकाई अध्यक्ष प्रभु त्रिवेदी ने कही। श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के पुस्तकालय सभागार में सोमवार अपराह्न गीत, ग़ज़ल और दोहों की त्रिवेणी प्रवहमान रही। रचनापाठ करते हुए सुधीर लोखण्डे 'अपेक्षित 'ने पढ़ा :--
‘वो कर्म ही कोई कर्म है, जिसमें सुसंस्कार नहीं’
दिनेश दवे ‘देव’ के तेवर कुछ यूँ थे :--
‘समय के कहाँ होते हैं हम पाबंद, लेकिन होते हैं कुछ चंद’।
ग़ज़लकार सुब्रतो बोस ने ज़वानी की बात कही :---
‘आशिकी की हसरतें हमसे न कीजिये,
बहके हुए ज़ज़्बात हैं, यूँ ही समझ लीजिये’।
गीतकार सुरेंद्र व्यास ‘सरल’ ने सुनाया :----
‘शीत सब हथियार डाले, धूप ने अपने पाँव निकाले,
छायी है मस्त बहार, फागुन आया रे’।
डॉ. दीप्ति गुप्ता की ग़ज़ल का शेर है :---
‘रेत-सी तप रही थी, सजल हो गई, तुम्हारे रंग में रंगी, मैं ग़ज़ल हो गई’।
इकाई के कोषाध्यक्ष व हास्य के मंचीय कवि प्रदीप नवीन ने सुनाया :---
‘कुछ भी अच्छा पढ़ नहीं पाया, इसलिये आगे बढ़ नहीं पाया’।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे इकाई सचिव संतोष मोहंती ‘दीप’ ने शहीदों का स्मरण करते हुए भावनाप्रधान गीत सुनाया :----
' देश पर जो कुर्बान हो गए, उन शहीदों को नमन ’।
वर्तमान विसंगतियों पर प्रहार करते हुए इकाई अध्यक्ष प्रभु त्रिवेदी ने
दोहे में कहा :---
‘साथ बहू के पुत्र है, मात-पिता चुपचाप। ख़ुद का जाया कह रहा, रहो अकेले आप’। इनके अतिरिक्त डॉ. ज्योति सिंह, अभियंता श्यामसिंह, अमरसिंह मानावत आदि अन्य साहित्यप्रेमियों ने भी रचनाएँ पढ़ीं। इस तरह नए रचनाकारों की उपस्थिति ने आयोजन को और गौरव प्रदान किया |
इकाई डेस्क
( समूह चित्र )
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