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Tuesday, 7 October 2014

इस पुस्तक में -

इस पुस्तक में -

"प्रेम सर्व व्यापक है इसे संस्कृति, समाज. देश-काल आदि सीमाऐं बाँध नहीं सकती।" इस चिंतन को लेकर इस पुस्तक में प्रयास किया गया है कि मनुष्य मात्र को नैसर्गिक रूप से प्राप्त इस गुण से उसे क्या-क्या संवेदनाएं, अनुभूति और आनंद प्राप्त हो सकता है। प्रेम के विषय में अनेक महापुरुषों, संतों, कवियों और चिंतकों के  उद्धृत कथनों का गुलदस्ता पेश किया गया है जिसकी खुशबू हमारे जीवन को  चिर-आनंदमयी बना सकती है। आधुनिक मनोविज्ञान मनुष्य के मन और सामाजिक व्यवहार की अत्यंत सूक्ष्म व्याख्या करता है- इस सिद्धांत को यहाँ वर्णित विषयों में बखूबी समाहित किया गया है। इसी प्रकार बोलचाल, संवाद, जन्म-मृत्यु आदि जीवन के घटकों की  भौतिक विज्ञानं के सिद्धांतों के अनुसार व्याख्या एवं दूसरी और वैदिक, पौराणिक तथा आध्यात्मिक दृष्टिकोण का समन्वयात्मक विश्लेषण इस पुस्तक की जान है।  वाणी से संवाद, दृष्टि से दृष्टिकोण और इन व्यंजकों से जीवन दर्शन की और बहती धाराओं को स्पष्ट देखा जा सकता है। यहाँ उल्लेख है कि कैसे रामचरितमानस, श्रीमद्भगवद्गीता, ,श्रीमद्भागवतमहापुराण आदि सद्ग्रन्थों में वर्णित संवाद सम्पूर्ण मानवजाति के भौतिक और आध्यात्मिक मूल्यों का संवर्धन कर सकते हैं।  हमारे चारों और नित्य घटती अच्छी-बुरी घटनाओं को धनात्मक दिशा में कैसे मोड़ा जा सकता है-वाम दर्शन के माध्यम से आप तक पहुँचाने का यह अभिनव प्रयास है। 

Monday, 30 June 2014

लेखक परिचय

लेखक परिचय

नाम: रामनारायण सोनी
पिता का नाम : स्व. श्री शंकरलाल सोनी
माता का नाम :स्व. श्रीमती दरियाव देवी सोनी
जन्म ; ०८ नवम्बर १९४८, तदनुसार - अश्विन माह, शुक्ल पक्ष, तिथि-सप्तमी, वि. सं. २००५
जन्म स्थान : ग्राम मकोड़ी , तहसील- जिला शाजापुर, मध्य प्रदेश
विशेष: आध्यात्मिक एवं धार्मिक  परिवार से विरासत में  प्राप्त परिवेश
शिक्षा : बी. ई. इलेक्ट्रिकल ( एस. जी. एस. आय. टी. एस. इंदौर )
शाषकीय सेवा : मध्य प्रदेश विद्युत मंडल में विद्युत यंत्री, १९७७ से २००६ तक एवं पश्चात २०१२ तक संविदा के अंतर्गत सेवा। विशिष्ट सेवा एवं तकनीकी उपलब्धियों के लिए मध्य प्रदेश पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी, इंदौर द्वारा पुरष्कृत।
अभिरुचियाँ : बचपन से ही चित्रकला , काव्य साधना, संगीत, आध्यात्मिक साहित्य -स्वाध्याय में रूचि।

Friday, 28 March 2014

रूहें बोलती हैं


रूहें बोलती है

            * आत्मा *

कौन कहता है कि- रूहें बोलती नहीं
हम सुनें न सुनें, रूहें बोलती है

रूह सदा सच बोलती है
सच वही है जो सदा से है, आज भी है, रहेगा भी
रूहें  सदा रहती है इसलिए सबसे बड़ी गवाह है
रूहों को झूँठ बोलना नहीं आता
रूहों के बोल जगत के जाल में फँस कर
झूँठ बन कर रह जाते हैं
इसलिए रूहों को बोलते ही सुन लो
सुन लो और गुन लो,
हार तो जीत का पहला सोपान है
इसलिए जीत से बड़ी हार है

कौन कहता है कि- रूहें बोलती नहीं
हम सुनें न सुनें, रूहें बोलती है
                     *                ’
कौन कहता है कि- रूहें सुनती नहीं
कोई कहे न कहे, रूहें सुनती हैं

रूहों में ज्ञान हो कि न हो भान होता ही है
वे आवाज नहीं भाव सुनती है
क्योंकि आवाज तो भाव की देह है
रूहों के भाव शब्द-रूप धरते हैं
जितने गहरे से उठते हैं, उतने गहरे जाते हैं
रूहों में सच सुनने की सामर्थ्य है
क्योंकि सच को सुनना अदम्य साहस है
रूहों में साहस से ही धृति है , धृति से ही धर्म है 

कौन कहता है कि- रूहें सुनती नहीं
कोई कहे न कहे, रूहें सुनती है
                       *
कौन कहता है कि रूहें बात नहीं करती
कोई बात करे न करे रूहें बात करती है

रूहों के द्वार नहीं होते
खिड़कियों से ही सम्प्रेषण होता है
खिड़कियां कभी बंद नहीं होती
खिड़कियों से अंदर बाहर सब दिखता है
जस का तस , कोई घाल-मेल नहीं
रूहों के संवाद की न कोई भाषा न कोई लिपि
इसलिए रूहों की भाषा मौन है
भावों का आरोह अवरोह इस का संगीत है
न साज न आवाज, फिर भी गीतो की गुन-गुन
रूह से रूह कहती है, रूह को रूह सुनती है
रूह में कोई शोध नहीं, वहाँ बोध ही बोध है
रूह तो पद्म पत्र है, न जल चिपका है-न अलग है
रूहों का कोई नाम नहीं, फिर भी पहचान बड़ी है 

कौन कहता है कि रूहें बात नहीं करती
कोई बात करे न करे रूहें बात करती है
                             *
कौन कहता है कि रूहें नहीं रहतीं
हम रहें न रहें, रूहें रहती हैं 

रूहें हमें पहनती हैं, ओढ़ती है, चलाती है,
रूहें न जलती हैं न जलाती है, न सोंखती है न सुखाती है  
लेकिन, रूहें मिलती है, मिलाती है 
आती है तो जगाती है, जाती है तो सुलाती है 
रूह है तो हम हैं, रूह है तो सब है 
सब में बसी जो रूह है, जिंदगी बस रूह है 
उस की तलब है तो जिंदगी गजब है 
उसका उजास है तो जिंदगी में साँस है 
उसके बगैर बाँक है, और जिंदगी बस ढाक है 
रूहें रहें कहीं भी फिर भी वे पास-पास हैं
करुणा रहे बरसती ये उसका विलास है
कौन कहता है कि रूहें फिर-फिर मिलती नहीं है

कौन कहता है  रूहें रहती नहीं है
हम रहें न रहें, रूहें रहती हैं 
                    *
           *परमात्मा *

जो तेरा है वो मेरा है,
जो सबका है वो अपना है
जगत में नूर उसका है
बिना उसके ये सपना है
रूहें मिले तो समझो, उसका कमाल है
रूहों की खैर रखना ,उसका जमाल है
रूहों कि मजलिसों में चर्चा हो इश्क का
उसके करम से अपनी, दुनिया रसाल है 

कौन कहता है कि- रूहें बोलती नहीं
कौन कहता है कि- रूहें सुनती नहीं
कौन कहता है कि- रूहें बात नहीं करती
कौन कहता है कि- रूहें नहीं रहतीं
कौन कहता है कि- रूहें फिर-फिर मिलती नहीं है


रामनारायण सोनी

Sunday, 16 February 2014

गोष्ठी

गोष्ठी 


दिनांक ०२ .०२.२ ० १४  को नाथूबा सभा गृह में इष्ट मित्रों की एक गोष्ठी का आयोजन हुआ।  इसका आह्वान श्री रामनारायण सोनी ने किया, सञ्चालन श्री अरविंदजी सोनी ने  किया।  आरम्भ देवी सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलित किया गया।  गोष्ठी में सर्वश्री बसंतिलालजी सोनी, कैलाशचन्द्रजी सोनी, सुभाषजी सोनी, रमेशजी वर्मा, पन्नालालजी सोनी, देवनारायणजी सोनी, कृष्ण कुमारजी सोनी, अरविंदजी सोनी और रामनारायण सोनी ने अपने अपने उद्बोधन दिए।  संक्षेपिका निम्नानुसार है -

दिनांक 0२ .०२. २०१४
समय अपरान्ह ०४ बजे से ०६ बजे तक
विषय प्रवर्तन - साहित्य और अध्यात्म
प्रत्येक सदस्य का निर्दिष्ट अधिकतम समय - १० मिनिट
गोष्ठी के कुछ अंश निम्नानुसार है-