यह कहानी श्री बी. डी. गुहा द्वारा वाट्सप पर भेजी गई
" भूख से मौत "
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जाने क्या सोच कर 'हरिया ' नाम रखा
उसका जीवन भर न तो हरियाली देखि न जीवन में हरापन ,सदा हारा हुआ ही रहा
माता ,पिता, भाई ,बहन,पत्नी,
बच्चे सभी अकाल बीमारी की भेंट
चढ़े, रह गया केवल हरिया कमजोर
बूढा लाचार जीने के लिए मात्र!चन्द
रूपये की तथाकथित पेंसन और पांच
किलो मोटा अनाज वः भी सरपंच
सचिव सेल्समेन की मेहरबानी पर !
उस दिन तो गजब हिहो गया सारे गाँव में हल्ला मचा हुआ था क़ि
" हरिया मर गया "
गाँव के ही एक छुट भैया 'पत्रकार ने
"सांध्य दैनिक " को खबर भेज दी
"हरिया की मौत ! भूख से हुई "
जब यह समाचार छपा उसके बाद सारे शहर में हड़ कंप मच गया....
शासन-प्रशासन स्तर से इस 'खबर' का 'जोरदार ' खंडन किया
गया किन्तु विपक्षी दल कहाँ मानने
वाले थे ! सबने शासन एवम् शासकीय
कार्यप्रणाली की खूब लानत-मलामत
की जिलाध्यक्ष ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए "जांच " की घोषणा कर दी .
जांच प्रारम्भ की गई सबसे पहले
तय हुआ "हरिया की लाश का शव -
परिक्षण "किया जावेगा लाश जिला
अस्पताल ले जाई गई ....
तब तक एस डी एम ने गाव का दौरा
कर हरिया की टूटी-फूटी झोपडी का
निरीक्षण कर उसमे अनाज रखवा दिया सरपंच ने भी अपने बयान में
झोपड़ी में अनाज होना बताया
दुसरे दिन शव परीक्षण की रिपोर्ट
के साथ हरिया की लाश वापस गांव
पहुची शव परीक्षण रिपोर्ट में कहा गया "हरिया के पेट में अन्न का एक -
दाना पाया गया "
हरिया की मौत भूख से नहीं हुई है
"वह स्वाभाविक मौत से मरा है "
लाश को घेरकर खड़े जमींदार ज़ालिम
पटवारी घसीटा राम सरपंच गोलमाल
सेल्समेन लेभागाराम तहसीलदार-
संग्रह सिंह एस डी एम पहुचाराम
सभी किंकर्तव्यविमूढ़ खड़े थे सर
झुकाये किसी के चहरे पर ग्लानि न थी
किन्तु सभी की अंतरात्मा धिक्कार
रही थी...
"हम सब ने हरिया को तिल-तिल कर मारा है "
हरिया ही नहीं मानवता भी मारी गई
किन्तु कोई स्वीकार ने को तैयार नहीं की " हरिया की मौत! भूख से हुई "
घटना और घटना के साथ जुड़े हुए
नाम काल्पनिक है .....
रचनाकार बी. डी.गुहा रायपुर
छत्तीसगढ़
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