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Thursday, 16 July 2015

samaji chintan

मेरे अपने व्यक्तिगत विचार -
समाज के उन व्यक्तियो लिए जो समाज के अगुआ हैं या जो व्यक्ति समाज के लिए चिंतित है । 

सामाजिक अधोसंरचना, एक सिद्धांत - 
1. समाज की सरलतम परिभाषा है कुछ व्यक्तियों का समूह।
2. समूह तब तक स्थिर नहीं हो सकता जब तक उसे बाँध कर रखने वाली कोई शक्ति न हो।
3. स्थिर हो भी जाय तो उसे दिशा चाहिये।
4. दिशा समाज को तभी सही मिल सकती है जब उसे सही नेता और नेतृत्व मिले।
5. नेतृत्व तब तक सही नही हो सकता जब तक उसकी परिधि मे संपूर्ण समाज की प्रत्येक इकाई का  ध्यान न रखा गया हो। और इसका दूसरा और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि समाज मे वह नेतृत्व अधिमान्य हो।
6. संगठित समाज अपने आप मे एक संस्था होती है। वह केवल लोकतान्त्रिक मूल्यों पर आधरित हो तभी चल सकती है। 
7. प्रत्येक संस्था का अपना एक बायलाज होता है। विचारणीय है कि क्या वह समाज से जुडी व्यवस्थाओं हेतु कोई आचार- संहिता रखता है ?
8. संस्था के आदर्श मुख्या घटक होते हैं; उसकी ऐतिहासिक, जीवन शैली (आजीविका सम्बंधित), सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और अपनी वर्तमान परिवेश में स्थिति। 


अ. इसलिए किसी भी सामाजिक संस्था के व्यवस्थापन और संचालन के लिए बिंदु क्र. ५ अति महत्वपूर्ण है। 
ब. नेतृत्व व्यक्तित्व को प्रतिष्ठा प्रदान करता है इसलिए व्यक्ति इसे केवल पद की प्राप्ति का माध्यम समझता है। 
स. वर्तमान में संस्थ चलाने में अनैतिक आर्थिक उपार्जन बहुतायत में है। 
द. शीर्ष में बैठे व्यक्तियों को शायद यह भी पता नहीं है की उस जाति और समाज का उद्गम और इतिहास क्या है। इकाई सदस्य इसे पूछ कर तो देखे। 
ई. कोई भी संस्था किसी प्रकार का बौद्धिक प्रकोष्ठ नहीं रखती जो समाज की प्रथा और रूढ़ियों का औचित्य तथा उनकी प्रासंगिकता का अध्ययन कर समाज में उपयोगिता का आधार तैयार कर सके। 
       जैसे पगड़ी प्रथा एक व्यवस्था रही होगी जो उस परिवार के उत्तराधिकारी को सामाजिक मान्यता प्रदान करती होगी लेकिन कालांतर में इसमें कितनी विकृति हुई। शायद यह युवराज को राजा प्रतिष्ठित करने की तरह रहा होगा। अब स्त्रियों की मृत्यु के बाद पगड़ी क्या प्रासंगिक है ?

मित्रों ! 
भारतीय संस्कृति की जड़ें वेदों में सूक्तों के रूप में लिखी हैं। मनुस्मृति की तरह की अन्य स्मृतियाँ हमारे सामाजिक ढांचे को समन्वय में रखने की आचार संहिताओं से भरी पड़ी है। शायद इस तरह का साहित्य गुरुकुलों में ही सिमट कर रह गया है। वास्तव में प्रथाओं का निर्वहन बुरा नहीं है लेकिन बिना औचत्य के अंधानुकरण उसे रूढ़ियों में तब्दील कर देता है , बस विज्ञान के इम्पीरिकल फार्मूलों की तरह चल पड़तीं है।
पुरखों ने ऐसा किया - हमें भी वही करना है। 
हमारे आस पास उन्नत समाजों ने जो समंजिक उत्थान किया है वह अंत्योदय पर आधारित है जो मिसाल की तरह अनुकरणीय है।  क्या अच्छ किया जा सकता है नेतृत्व अच्छी तरह जनता है , आवश्यकता है दृढ इच्छा-शक्ति की। 
मेरी मान्यता है की यह एक जनजागृति का विषय है, जिसकी शुरुआत शायद मुझ से ही है। अनुनय है कि ये उन समाज के पुरोधाओं के कान में जरूर फूंके जो समाज में प्रितष्ठा के पदों पर पदासीन हैं। 

रामनारायण सोनी 



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Morning Greetings...!!!
5 FACTS ABOUT LIFE.
1. No matter how beautiful/ handsome you are, just remember baboons and gorillas also attract tourists.
2. No matter how big and strong you are, you shall not carry yourself to the grave.
3. No matter how tall you are, you can never see tomorrow.
4. No matter how light skinned you are, you always need a light in the dark.
5. No matter how rich and how many cars you have, you will always walk to the toilet. ....
So take it easy....and be simple….
Have a Fabulous Friday...!!!



सुप्रभात !!!

भावार्थ:-
जीवन के पाँच तथ्य.... 

१. चाहे जितने भी आप सुन्दर हैं, याद रहे कि (बदसूरत) लंगूर और गोरिल्ले पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण होते हैं। 
२. चाहे जितने भी आप बड़े और बलिष्ट हों, आप अपनी अंतिम यात्रा चल कर पूरी नहीं करेंगे। 
३. चाहे जितने भी आप ऊँचे हों, समय की दीवार के उस पर भविष्य नहीं  देख पायेंगें। 
४. चाहे जितने भी आप गौर वर्ण के हों, अंधकार में तो काले ही हो। 
५. चाहे जितने भी आप महंगी कर के मालिक हों, वहाँ पैदल ही जाना है। 

इसलिए सामान्य और सहज रहें। 

सर्जना मंच 







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