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Tuesday, 24 December 2013

कबीरा जनम अमोल

कबीरा जनम अमोल
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।


मधुरास की मँजुल घड़ी है ।
मधुपुरी की मधुपरी को पुष्प का न्योता मिला है
अब प्रणय की स्वामिनी का चल पड़ा यह सिलसिला है। 
स्वांति के घन बिन्दु को फिर तृषित चातक मिला है
घन घनक उट्ठे गगन में सन सनन बहती पवन है ।।
स्नेह् की लेकर मथानी प्रेम का सागर मथें हम
छोड़ कर छल छद्म सारे प्यार निर्मल शुचि करें हम।
गहन तम से जूझते मृदु-दीप का सिंचन करें हम
प्रीत का उल्लास लेकर प्यार की बातें करें हम ।।
एहसास के सुंदर नगर में प्यार का उपवन सजा है
मानिनी मन मौज में मनुहार तेरा कर रहा है ।
खोल दो सब गाँठ मन की सामने मंज़िल खड़ी है
अँजुरी में पुष्प भर लें मधुरास की मँजुल घड़ी है ।।

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