कबीरा जनम अमोल
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
| मधुरास की मँजुल घड़ी है । |
| मधुपुरी की मधुपरी को पुष्प का न्योता मिला है |
| अब प्रणय की स्वामिनी का चल पड़ा यह सिलसिला है। |
| स्वांति के घन बिन्दु को फिर तृषित चातक मिला है |
| घन घनक उट्ठे गगन में सन सनन बहती पवन है ।। |
| स्नेह् की लेकर मथानी प्रेम का सागर मथें हम |
| छोड़ कर छल छद्म सारे प्यार निर्मल शुचि करें हम। |
| गहन तम से जूझते मृदु-दीप का सिंचन करें हम |
| प्रीत का उल्लास लेकर प्यार की बातें करें हम ।। |
| एहसास के सुंदर नगर में प्यार का उपवन सजा है |
| मानिनी मन मौज में मनुहार तेरा कर रहा है । |
| खोल दो सब गाँठ मन की सामने मंज़िल खड़ी है |
| अँजुरी में पुष्प भर लें मधुरास की मँजुल घड़ी है ।। |
No comments:
Post a Comment